स्त्री के तीन रूप होते है इसीलिए एक सम्पूर्ण जीवन में तीन चरित्र यही है त्रिया चरित्र इस लोग नकरात्मक रूप में लेते है...बुध शुक्र चंद्र ती...
स्त्री के तीन रूप होते है इसीलिए एक सम्पूर्ण जीवन में तीन चरित्र यही है त्रिया चरित्र इस लोग नकरात्मक रूप में लेते है...बुध शुक्र चंद्र तीनो ग्रह निरंकुश है इनपे बृहस्पति ही अधिकार करके इन्हे योग्यता देते है। महत्वपूर्ण बनाता है।
बालक बुध
युवा मंगल
पिता सूर्य
इन तीनो को अधिकार देते है बृहस्पति.....
इसीलिए परिवार में गृहस्थ सुख हेतु गुरु का होना अनिवार्य है.
पूरन पंडित
स्त्री के तीन रूप — कन्या, स्त्री और माँ
बंधुओ, हमारे जीवन में स्त्री केवल एक रूप में नहीं आती।
एक ही स्त्री जीवन की अलग-अलग अवस्थाओं में तीन महत्वपूर्ण रूप धारण करती है—
कन्या — बुध
स्त्री — शुक्र
माँ — चंद्र
इसीलिए हमारे शास्त्रीय चिंतन में स्त्री के इन तीन रूपों को समझना आवश्यक है। इन्हीं विविध रूपों और उनके स्वभाव को बिना समझे कही गई बातों को लोग कभी-कभी नकारात्मक अर्थ में “त्रिया चरित्र” कह देते हैं, जबकि जीवन की दृष्टि से यह स्त्री के बहुआयामी स्वरूप को समझने का विषय है।
बुध, शुक्र और चंद्र—ये तीनों अपनी-अपनी प्रकृति के प्रतीक हैं। इनकी ऊर्जा को दिशा, विवेक और मर्यादा देने वाला बृहस्पति है। गुरु जब अधिकार और विवेक देता है, तब यही शक्तियाँ परिवार और समाज के लिए योग्यता, गरिमा और महत्व का कारण बनती हैं।
अब पुरुष जीवन को देखिए—
बालक — बुध
युवा — मंगल
पिता — सूर्य
बालक में बुद्धि और जिज्ञासा, युवा में साहस और कर्मशक्ति तथा पिता में उत्तरदायित्व और नेतृत्व का भाव दिखाई देता है।
इन शक्तियों को भी सही दिशा देने वाला गुरु ही है।
इसीलिए गृहस्थ जीवन में केवल धन, साधन और संबंध पर्याप्त नहीं हैं।
परिवार में गुरु, अर्थात् विवेक, संस्कार और सही दिशा देने वाली शक्ति का होना अनिवार्य है।
जहाँ गुरु का मार्गदर्शन है, वहाँ बुध को बुद्धि मिलती है, मंगल को मर्यादा मिलती है, शुक्र को गरिमा मिलती है, चंद्र को शांति मिलती है और सूर्य को उत्तरदायित्व।
गृहस्थ सुख केवल साथ रहने से नहीं आता—
सही दिशा में साथ चलने से आता है।
— पूरन पंडित


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