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दीपावली का महत्व-छोटी दीपावली-नरक चौदस कथा-पूजन विधि-पड़वा-भैयादूज -dipawali-ka-mahatv-chhoti-dipawali-narak-chudas-padava-bhaidooj

  diwali-pooja दीपवली-   Deepawali दीपावली भारत का एक बहुत बड़ा त्योहार है। यह सभी परों में मनाया जाता है। दीपावली के दिन अमीर-गरीब सभी लोग ...

 
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दीपवली- Deepawali

दीपावली भारत का एक बहुत बड़ा त्योहार है। यह सभी परों में मनाया जाता है। दीपावली के दिन अमीर-गरीब सभी लोग दीये जलाते है। दीपावली का मतलब है दीपकों की पंक्ति अर्थात दीप तथा अवली मिलकर दीपावली शब्द बना है। नई रुई की बत्ती डालकर दीये जाते हैं और फिर उन्हें लाइनों में लगाते हैं। ये जलते हुए दाप बहुत ही सुन्दर लगते हैं। दीये जलाकर हम लक्ष्मी का आह्वान करते हैं। लोगों को मान्यता है कि जिन घरों में रोशनी नहीं होती, उस घर में लक्ष्मीजी नहीं आती। लक्ष्मीजी धन-दौलत और खुशहाली की देवी हैं, इसलिए इसे बुलाने के उपाय तो सभी करते हैं, यहां तक कि अन्य धर्मों के अनुयायी जैसे मुसलमान, ईसाई, सिख और पारसी भी इस दिन दीये जलाते। हैं।

दीपावली का महत्व -dipawali-ka-mahatv

दीपावली का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती तथा जैनियों के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी को इसी दिन निर्वाण प्राप्त हुआ था। आर्य समाजी और जैनी लोग इस दिन को महापुरुषों के जन्म दिवस के रूप में मनाते हैं।

दीपावली का त्योहार अक्तूबर-नवंबर के महीने में आता है। हिंदी के हिसाब से यह कार्तिक के महीने में अमावस्या के दिन पड़ता है। इसी दिन रामचन्द्रजी वनवास के 14 वर्षों की अवधि पूरी करके वापस आए थे और उन्हें राजगद्दी पर बिठाकर अयोध्या के 'राजा' पद से विभूषित किया। गया था। उस दिन पूरे देश में खुशियां मनाई गई थीं, रोशनी की गई थी और लोगों ने स्वादिष्ट भोजन बनाकर खाए थे। वही चलन अभी तक चला आ रहा है। स्पष्ट है कि यह त्योहार राम को राजगद्दी मिलने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

दीपावली बहुत हंसी-खुशी का त्योहार है। सभी जगह सभी लोग एक-दूसरे के घर जाकर आपस में मिलते हैं, अच्छे और स्वादिष्ट भोजन बनाते, खाते और खिलाते हैं। अनेक प्रकार की मिठाइयां घर में तो बनाते ही हैं, बाजार से भी कई चीजें लाते हैं। भोग के लिए पेठे की मिठाई का बड़ा महत्व मानते हैं। घर-घर में खाने-पीने का आयोजन तो खूब रहता ही है, साथ ही दीपावली की रात को ताश खेलने का भी बड़ा चलन है। यह घर वालों, मित्रों और परिचितों के साथ हिलमिलकर बैठने और बातचीत करने का साधन है। कालांतर में लोग इस चलन का उपयोग गलत तरीके से करने लगे और मनोरंजन के लिए खेलने वाले ताश के खेलों के बदले जुआ खेलने लगे, जिसमें हजारों रुपयों के वारे-न्यारे हो जाते हैं।

दिपावली कब होती है-dipawali-kab-hoti-hai

यूं तो दीपावली की शुरुआत (आश्विन) नवरात्रि के पहले से ही हो जाती है, जब लोग अपने-अपने घरों में सफाई करवाते हैं। खिड़की, दरवाजों पर रंग-रोगन करवाते हैं। पहली नवरात्रि यानी देवीजी की प्रतिपदा (पड़वा) से रामलीला आरंभ होती है, जो पूरे महीने भर चलती | है। यह दीपावली के दिन रामचन्द्रजी को राजगद्दी प्राप्त होने के बाद समाप्त होती है। रोज कुछ-न-कुछ लीलाएं होती हैं, रोज की झांकियां निकलती हैं, लेकिन गृहस्थियों की दीवाली धनतेरस से आरंभ होकर भैयादूज को समाप्त होती है।

दिपावली मे धंतेरस का महत्व-dipawali-me-dhanteras-ka-mahatv

अमावस्या के दो दिन पहले धनतेरस होती है। इसे धनवंत्री त्रयोदशी भी कहते हैं। धनतेरस के दिन ही, जब देवताओं और राक्षसों ने समुद्र मंथन किया था, तब धनवंत्री वैद्य हाथ में अमृत का कलश लेकर समुद्र से प्रकट हुए थे, इसीलिए इस त्योहार का नाम धनवंत्री त्रयोदशी धनतेरस पड़ा। इस दिन नया बर्तन खरीदने का चलन है, इसलिए लोग | कुछ-न-कुछ अवश्य खरीदते हैं।

धनतेरस धन्वंतरि जयंती  22 अक्टूबर

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छोटी दीपावली-chhoti-dipawali

दूसरे दिन चौदस को छोटी दीपावली होती है। इसे नरक चौदस कहते हैं। सुबह से सारे घर की सफाई और धुलाई करके घर के सब लोग सिर धोकर नहाते हैं। स्त्रियां माथे पर चोंपबेंदी लगाकर किनारी के कपड़े | पहनकर मीठी मठरियों की गोदी लेती हैं और घर के सब लोगों को देती हैं। यही खाकर सब नाश्ता करते हैं।

नरक चौदस कथा-narak-chaudasi-katha

नरक चौदस के विषय में एक प्राचीन कथा प्रसिद्ध है। द्वापर युग नरकासुर नामक एक अत्यंत भयानक राक्षस था। उसने देवताओं और मनुष्यों सभी को बहुत तंग कर रखा था। सब बहुत दुःखी थे। श्रीकृष्ण भगवान ने उसे इसी दिन मारा था, इसलिए इस त्योहार का नाम नरक चौदस पड़ा। उसके मरने की खुशी में यह त्योहार मनाया जाता है।

नरक चौदस के दिन भगवान ने वामन रूप धरकर राजा बलि से तीन पग पृथ्वी का दान मांग लिया था और उसे पाताल लोक का राजा बनाकर भेज दिया था। राजा बलि महादानी था। इंद्र को उससे डर लगने लगा कि कहीं राजा बलि उसका राज्य न छीन ले। उसने विष्णु भगवान से प्रार्थना की, बहुत विनती की, तब विष्णु भगवान ने वामन रूप में आकर छल से उसका (राजा बलि का) सारा राज्य ले लिया। दक्षिण भारत में मान्यता है। कि ओणम के दिन हर वर्ष राजा बलि आकर अपने पुराने राज्य को देखता है। इसी उपलक्ष्य में वहां के लोग भांति-भांति के भोजन बनाकर राजा बलि को अर्पण करते हैं। विष्णु भगवान की पूजा के साथ-साथ राजा बलि की भी पूजा की जाती है। इसी दिन भगवान कृष्ण ने सोलह हजार एक सौ कन्याओं को राक्षसो के चंगुल से छुड़ाया था। इस खुशी में भी यह त्योहार मनाया जाता है।

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चौदस के दिन हनुमानजी का जन्म दिवस भी है। उनके भोग के लिए मीठी पूरियां बनाते हैं और बहुत से लोग बेसन के लड्डुओं का भोग लगाते हैं। शाम को पूजा के स्थान पर चौक लगाकर (अल्पना बनाकर) उस 2 पर चौकी रखते हैं। चौकी पर भी चौक लगा देते हैं। उस चौक पर धुले हुए मिट्टी के दीये रखकर उनमें एक-एक बत्ती डाल देते हैं, पर तेल नहीं डालते। चौदस को ठंडे दीयों की ही पूजा करते हैं। चौकी के सामने बिछौना बिछाते हैं, जिस पर घर के सभी लोग बैठते हैं। जो घर की बड़ी महिला होती है, यह सब को टीका लगाती है और फिर सब लोग दीयों की पूजा करते हैं। इसके बाद पांच दीयों में तेल डालकर जला दिया जाता है, फिर एक पूजा में, एक तुलसी के थमले पर, एक रसोई में, एक सामने के दरवाजे पर और एक पीछे के दरवाजे पर रख देते हैं।

नरक  चतुर्दशी  23 अक्टूबर

 हनुमान जयंती  23 अक्टूबर

छोटी दीपावली 23अक्टूबर

बड़ी दीपावली को क्या होता है-badi-dipawali-ko-kya-hota-hai

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बड़ी दीपावली को सारे घर के दरवाजों की देहलियों पर खड़िया मिट्टी और चावल के आटे के चौक (अल्पना) लगाए जाते हैं। यह काम लड़कियों और बहुओं का होता है। वे भांति-भांति के सुन्दर चौक लगाकर | अपनी कला का परिचय देती हैं। दोपहर से ही चौक लगाना शुरू हो जाता है। पूजा के स्थान पर बड़ा-सा चौक लगाते हैं, जो सूखकर रात को बिजली की रोशनी में बहुत ही सुन्दर लगता है। पूजा के स्थान पर पूजा की चौकी रखते हैं और उसके ऊपर दीवार पर दीपावली की तस्वीर बनाकर उसके दोनों और चंवर डुलाने वाले भक्त बना देती हैं और उसके चारों ओर | सारे देवता बनाती हैं। यह सारी ड्राइंग पहले पेंसिल से बनाकर बाद में उनमें रंग भर देती हैं और फिर सुनहरे और रूपहले रंग लगाकर उसे | चमकदार बना देती हैं। यह तैयार होकर बहुत ही सुन्दर लगता है। स्त्रियां महीनों पहले से इस बनाना आरंभ कर देती है। स्त्रियां गांवों में भी यह सब बनाती हैं, पर वे दीवार पर ही बनाकर रंग भर देती हैं, कागज पर नहीं बनाती। दीवार को पहले गोबर मिट्टी से लीपकर सूख जाने पर खड़िया मिट्टी या चूने से पोत लेती हैं और फिर उस पर चित्रकारी करती हैं। दीपावली के तख्ते के सामने रखी हुई पूजा की चौकी पर ऐपन से चीक लगाकर, उस पर लक्ष्मीजी और गणेशजी की मूर्तियां या तस्वीरें रख देते हैं। चौकी के ठीक सामने पूजा का चौक ऐपन से लगाकर उस पर एक बड़ा घी का दीया रख देते हैं, जो रात भर जलता रहता है। दीपावली के दिन लक्ष्मी-गणेश के अतिरिक्त अन्य देवताओं का पूजन भी किया जाता है।

दीवाली  दीपोत्सव 24 अक्टूबर

भौमवती  अमावस्या 25अक्टूबर

पूजन विधि-poojan-vidhi

दीपावली की रात को चार बार पूजा होती है। शाम को दीयों में तेल डालकर पूजा के स्थान पर रखकर जला लेते हैं और फिर जले हुए दीयों को रोली, चावल, फूलों से पूजा करके सब जगह घर में और बाहर रखने को ले जाते हैं। रात को दस बजे लक्ष्मीजी की पूजा होती है। लक्ष्मी के सामने जेवर तथा नकद रुपए भी रखे जाते हैं। कमल का फूल चढ़ाने का बड़ा भारी शगुन मानते हैं। अगरबत्ती और धूपबत्ती भी जरूर जलाई जाती है। उस समय दीपावली के तख्ते पर, दीपावली के मुंह पर ऐपन से पान के ऊपर रुपया चिपकाकर पान के नीचे भी ऐपन लगाकर चिपका देते हैं, फिर पूजा करते हैं। जल, ऐपन, रोली, चावल और फूलों से पूजा करते हैं और कलावा चढ़ाते हैं। 

पूजन के बाद फलों और मिठाइयों का भोग लगाते हैं और आरती करते हैं। मिठाइयों में पेठे की मिठाई का शगुन | मानते हैं। इस सब पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं, फिर खाना खाते हैं और फिर ताश खेलने बैठ जाते हैं। रात को 12 बजे लक्ष्मीजी की दूसरी पूजा होती है। इस समय केवल रोली, चावल और फूलों से ही पूजा करते हैं और लक्ष्मीजी को मिठाई के अलावा खीलें और बताशे भी चढ़ाते हैं, उनका खास शगुन मानते हैं। इस पूजा के बाद लोग फिर अपने खेल पर बैठ जाते हैं। अंतिम पूजा सुबह चार बजे प्रवेश द्वार पर होती है। यह नगर बसौने की पूजा है। इसका मतलब है कि लक्ष्मीजी को पूजन करके घर में ले आए। जिस प्रकार जब बेटी पीहर आती है, तब ड्योढ़ी पर नगर बसीने की पूजा करवाकर उसे घर के अन्दर लाते हैं, उसी प्रकार लक्ष्मीजी को भी पूजा करके घर में लाते हैं, जिससे वह घर में विराजें और सुख शांति बनी रहे।

दीपावली के दूसरे दिन प्रतिपदा (पड़वा)-dipawali-ke-dusre-din-pratipada

दीपावली के दूसरे दिन प्रतिपदा (पड़वा) को अन्नकूट होता है। भगवान विष्णु को भोग लगाने के लिए अनेक प्रकार के भोजन बनाए जाते। है। सर्वविदित है कि भगवान को भोग 36 प्रकार के व्यंजनों का लगता है। इस दिन लोग अपने नाते-रिश्तेदारों को भी प्रसाद ग्रहण करने के लिए बुलाते हैं।

प्रतिपदा (पड़वा) के दिन गोवर्धन की पूजा भी होती है। इसी दिन श्रीकृष्ण भगवान ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठा लिया था। एक बार इंद्र ब्रजवासियों से क्रोषित हो गया था, क्योंकि उन्होंने उसकी पूजा न करके कृष्ण को पूजा था। इंद्र ने वर्षा करनी शुरू की, जो कई दिनों तक बंद नहीं हुई और सारा ब्रज डूबने लगा। ब्रजवासी रोते-चिल्लाते श्रीकृष्ण के पास आए, तब उन्होंने सबको सांत्वना दी और गोवर्धन पर्वत को उठाकर उसके नीचे सबको शरण दी। कृष्ण का प्रताप देखकर इंद्र ने वर्षा बंद कर दी और स्वयं कृष्ण की शरण में आ गया। उसी दिन से कृष्ण गोवर्धनधारी कहलाए और उनके उसी रूप की पूजा होने लगी।

अन्न कूट  गोवर्धन पूजा 26 अक्टूबर

भैयादूज की पूजा- bhaidooj-ki-pooja

 प्रतिपदा (पड़वा) के दूसरे दिन भैयादूज होती है। दूज के दिन बहनें अपने भाईयों की मंगल कामना के लिए उनको टीका करती हैं।मिठाई,पान, गरी का गोला, बताशे, फूल और साबुत सुपारी उन्हें गोदी में देती हैं और अच्छे स्वादिष्ट भोजन खिलाती हैं। दूज के दिन कढ़ी-चावल और खीर बनाने का चलन है। इस मौके पर भाई बहनों को रुपए देते हैं और कई लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार साड़ी ब्लाउज या घर की और चीजें भी दे देते हैं। इस प्रकार दीपावली का त्योहार धनतेरस से लेकर भैयादूज तक, पांचों दिन खूब धूमधाम से मनाया जाता है। दीपावली से कई दिन पहले से ही खूब पटाखे और आतिशबाजियां शुरू हो जाती हैं, लोगों में खूब जोश बढ़ है। खास दीपावली के दिन शाम को दीये जलाकर बच्चे फुलझड़ियां और पटाखे जलाते हैं, लेकिन अब धीरे-धीरे इन चीजों का रिवाज कम आता होता जा रहा है। कारण यही है कि कई बार तो दुर्घटनाएं हो गई और इसके अतिरिक्त अब तो महंगाई ने सबके हाथ जकड़ लिए हैं।

काशी  गोर्वधन  पूजा  भईया दूज  27 अक्टूबर

चित्रगुप्त पूजा 27 अक्टूबर

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कारोबार में दीपावली का महत्व- 

बैकों और पोस्ट ऑफिसों में दीपावली बहुत अच्छी तरह मनाते हैं। बहुत लोगों को बुलाते हैं, प्रसाद बांटते हैं और साथ ही कुछ तोहफा भी देते हैं और रोशनी का तो कहना ही क्या ! व्यापारियों का नया साल दीपावली से ही आरंभ होता है। वे लोग सारा पुराना हिसाब समाप्त करके दीपावली से नए खाते खोलते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि दीपावली ऐसा त्योहार है, जो सभी के लिए | महत्वपूर्ण है। यह शरद ऋतु के आगमन की याद दिलाता है। किसान भी इसके बाद अपनी नई फसल बोने में संलग्न हो जाते हैं।

दीपावली के दिन सभी स्थानों में लक्ष्मी का पूजन होता है। लक्ष्मी समृद्धि की देवी तो है ही, साथ ही शील तथा सौंदर्य और अधिष्ठात्री भी हैं। हजारों-लाखों की संख्या दीप जलाए जाते हैं। वे लोगों के हृदय को भी आलोकित कर देते हैं और सभी के मन में उत्साह, उमंग और दूसरों के लिए अच्छी भावनाओं का संचार करने का संदेश देते हैं।

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