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ये जीवन जो मिला हैं ये प्रारब्ध वश मिला हैं,,प्रवचन गुरु पूर्णिमा के अवसर पर

 गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आज पूज्य श्री पंडित पूरण मिश्र जी महाराज शिष्यों से मिले.... उन्होंने प्रवचन में कहा कि ये जीवन जो मिला हैं ये प्र...

 गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आज पूज्य श्री पंडित पूरण मिश्र जी महाराज शिष्यों से मिले....

उन्होंने प्रवचन में कहा कि ये जीवन जो मिला हैं ये प्रारब्ध वश मिला हैं,, इस जीवन में शरीर के कर्म हैं जो कुल जाति मर्यादा रिश्तो से बंधे हैं,, यहाँ शरीर शरीर मायावी कर्मो से जकड़ा हैं, सब पे धन वैभव रिश्तो की भावनाओं से बँधा हैं.।

होशियार जागरूक व्यक्ति ही इन बंधन को प्रेम बंधन मानके केवल एक प्रबंधन करता मानता हैं!

प्राप्त कर्तव्य निभाए एवं मूल कारण निवारण निभाए अर्थात पूर्व जन्मो का ऋण उतारना हैं नया कर्म सदकर्म करना हैं,, आज लोग माया में भूल जाते हैं ये शरीर पालन में जो पाप कर्म कर रहे हैं वो उन्हें नर्क में गिरा देगा... नर्क के मार्ग हैं काम क्रोध लोभ मोह यकीन मानो ये आपके भटकाव हैं, ये दिखते लक्ष्य की तरह हैं ये हो जाए, ऐसा हो जाए इस तरह हो जाए इसी में आप हम फस कर अनमोल समय गंवा रहे हैं फिर जीवन कब निकल गया पता नहीं चलता,, आज ही जागो नाम जप में व्यक्तिगत सुख हैं आत्मा का आनंद हैं आप सब कर्म वैसे करो जैसे एक नौकर मालिक का सब काम करता हैं फिर अपना काम भीं करता हैं... तो आपका अपना काम हैं गुरु वचनो का पालन... नर रूप में सद्गुरू की खोज,, ये खोज जैसे पूरी होंगी नाम मिलेगा... नाम का निरंतर जप करना रूप निर्माण करेगा... वो रूप साकार होगा तो कैसे प्राप्त करोगे तो गुरु अभ्यास हैं गुरु वो सब कुछ नाम देकर दिलवा सकता हैं जिसकी तुम्हे परलोक में आवश्यकता हैं।

इस लोक में गुरु अभ्यास करवाता हैं जो गुरु माया मनोकामना हेतु लालच देता हैं समझ लो वो स्वयं दलदल में फंसा हैं तुम्हे निकालने का झांसा देकर खुद निकलना चाहता हैं अपना मतलब सिद्ध कर रहा हैं...... शुक्राचार्य जी की तरह वे सदैव अपने शिष्यों को भौतिक बल लाभ हेतु यज्ञ करते हैं करवाते हैं ताकि देवताओं से बदला ले सके.... राजा बली की धर्म निष्ठा से भगवान प्रसन्न थे उनके पुण्य बढ़ गए सब लोको को प्राप्त करने में सक्षम थे तो भगवान ने सोचा इसने यज्ञ किया मेरे लिए.... गुरु इस राजा इंद्र की तुच्छ पदवी दिलवाना चाहते हैं बल्कि ये उससे अधिक योग्य हैं मतलब जो चीज एक लाख में मिल रही हैं उसके लिए सम्पूर्ण सम्पति दांव पे लगाना बुद्धिमानी नहीं,,, लेकिन भगवान हर जन्म लेने वाले शरीर को स्वतंत्र छोड़ते हैं,, वो फसना चाहता हैं या मोक्ष चाहता हैं।

भगवान भिक्षुक बन गए गुरु ने बता दिया ये भिक्षुक नहीं भगवान हैं इस बात पर बलि को विश्वास था... किन्तु गुरु ने कहा मेरी मानो इसे भगा दो ये सब कुछ मांग कर तुम्हे भिक्षुक बना देगा...... अब लगाया दिमाग़ बलि ने सोचा गुरु ने बता दिया भगवान हैं तो भगवान को देने में भौतिक हानि तो दिख रही हैं किन्तु हमें पार लौकिक लाभ हैं... भगवान लेने के बाद स्वयं कहा रखते हैं उनके भंडारा तो भरे हैं तो देना चाहिए संकल्प किया दिया,, यहाँ गुरु के वचन को नहीं माना... लाभ हुआ कि भगवान ने सबकुछ ले लिया.... फिर वरदान में बलि ने भगवान को ही चौकीदार बना लिया... भोलेनाथ ने भक्तों की बागडोर

संभाली,जो काम श्री हरि करते थे... वो सपरिवार सेवा हेतु तत्पर हुए हरि हर कृपा....

हरि पाताल में बलि हो सुख दे रहे थे, शिव सावन मास पृथ्वी पर भक्ति की धारा अभिषेक अर्चना से सबके भंडार भर रहे थे... क्यूंकि बिना नारायण के लक्ष्मी जी उदास रहती थी... श्री हीन धरती पर बिल्व वृक्ष जड़ बन गयी थी तो शिव ने सिर पे धारण किया उनकी जलन पूर्णिमा सावन को पूर्ण हुई जब बलि को रक्षा बाँधी... कहा तुम मेरे भाई हो तुम्हे तीनो लोको की श्री प्राप्त होंगी... तुम्हारे नाम से दान  कर रक्षा सूत्र बंधवा कर हर पुरुष की स्त्री की मै रक्षा करूंगी,, उसके दर कभी दरिद्र नारायण नहीं जाएंगे,, शिव जी ने भीं सभी देवताओं ने कहा जी ठीक हैं हर यज्ञ में भगवान के ब्राह्मण रूप भगवान को दिया दान बलि के दान के समान होगा,, सभी यज्ञ बलि जी के नाम से पूर्ण होंगे.. तो रक्षाबंधन आरम्भ हुआ।

बहन की मनोकामना में नारायण मिले श्री महालक्ष्मी को.... बलि हो श्री मिली।

तो भक्तों हर कर्म का कर्तव्य का भार हरि पे छोड़ो भोलेनाथ गारंटी लेते हैं यहाँ सब ठीक होगा वहाँ हरि का बैकुंठपुर आपके स्वागत में तत्पर होगा।

बोलिए सद्गुरु महाराज की जय राधे राधे सीताराम

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