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भगवान श्रीकृष्ण को शुकदेवजी के जन्म से पहले गर्भ में ही उनकी जमानत क्यों देनी पड़ी?

महर्षि वेदव्यास के पुत्र, परम ज्ञानी, वैराग्य और ब्रह्मज्ञान के साकार स्वरूप श्रीशुकदेवजी का जन्म भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की सबसे अद्भुत घट...



महर्षि वेदव्यास के पुत्र, परम ज्ञानी, वैराग्य और ब्रह्मज्ञान के साकार स्वरूप श्रीशुकदेवजी का जन्म भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की सबसे अद्भुत घटनाओं में से एक माना जाता है। उनका जन्म केवल एक ऋषिपुत्र के रूप में नहीं, बल्कि संसार को यह बताने के लिए हुआ कि सच्चा ज्ञान और वैराग्य क्या होता है।

महर्षि वेदव्यास ने लोककल्याण के लिए भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उन्होंने प्रार्थना की कि उन्हें ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो स्वयं समाधि के आनंद का अनुभव करे और उसी दिव्य आनंद का मार्ग संसार को दिखाए। भगवान शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर वरदान स्वीकार किया।

समय आने पर व्यासजी की पत्नी वाटिका गर्भवती हुईं, किंतु यह कोई साधारण गर्भ नहीं था। एक-दो नहीं, पूरे बारह वर्ष बीत गए, फिर भी बालक ने जन्म नहीं लिया। इस दौरान व्यासजी के आश्रम में प्रतिदिन वेद, पुराण, उपनिषद और भगवान की कथाओं का श्रवण होता था। गर्भस्थ बालक सब कुछ सुनता, समझता और स्मरण कर लेता। कहते हैं कि उसने गर्भ में ही समस्त शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

समय बीतने के साथ माता को अत्यंत कष्ट होने लगा। तब महर्षि वेदव्यास ने गर्भस्थ बालक से कहा—

"पुत्र! अब बाहर आओ। तुम्हारी माता अत्यधिक पीड़ा सह रही है।"

गर्भ से उत्तर आया—

"मैं असंख्य जन्मों में चौरासी लाख योनियों का भ्रमण कर चुका हूँ। अब मैं इस संसार में पुनः माया के बंधन में नहीं पड़ना चाहता। गर्भ में रहते हुए आत्मज्ञान, वैराग्य और पूर्वजन्मों की स्मृति बनी रहती है, लेकिन जन्म लेते ही भगवान की माया जीव को सब कुछ भुला देती है। इसलिए मैं बाहर नहीं आऊँगा।"

व्यासजी ने समझाया—

"तुम्हें माया स्पर्श भी नहीं करेगी। मेरी बात मानो और जन्म लेकर अपनी माता को इस कष्ट से मुक्त करो।"

तब गर्भस्थ बालक ने एक अद्भुत शर्त रखी—

"यदि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण यह वचन दें कि जन्म के बाद भी मैं उनकी योगमाया से मोहित नहीं होऊँगा, तभी मैं गर्भ से बाहर आऊँगा।"

यह सुनकर महर्षि वेदव्यास तत्काल भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुँचे और सारी बात निवेदित की।

भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण स्वयं आश्रम आए और गर्भस्थ बालक से बोले—

"हे महात्मा! मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि जन्म लेने के बाद भी मेरी माया तुम्हें स्पर्श नहीं करेगी। तुम सदैव आत्मज्ञान में स्थित रहोगे। अब निश्चिंत होकर बाहर आओ।"

भगवान के इस आश्वासन के बाद ही वह दिव्य बालक गर्भ से बाहर आया।

आश्चर्य की बात यह थी कि वह नवजात शिशु नहीं, बल्कि लगभग बारह वर्ष के तेजस्वी कुमार के रूप में प्रकट हुआ। जन्म लेते ही उसने भगवान श्रीकृष्ण, माता-पिता को प्रणाम किया और बिना किसी मोह के वन की ओर चल पड़ा।

व्यासजी ने प्रेमपूर्वक पुकारा—

"पुत्र! ठहरो। तुम्हारे संस्कार तो अभी शेष हैं।"

शुकदेवजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया—

"पिताश्री, अनगिनत जन्मों में मैं असंख्य संस्कार करा चुका हूँ। अब मुझे केवल परमात्मा की प्राप्ति करनी है।"

भगवान श्रीकृष्ण मुस्कराए और बोले—

"यह बालक शुक (तोते) के समान मधुर वाणी वाला है। इसका नाम शुक होगा। यह जन्म से ही मोह और माया से परे है। इसे इसकी इच्छा के अनुसार जाने दीजिए।"

भगवान के प्रस्थान के बाद महर्षि वेदव्यास और शुकदेवजी के बीच गहन आध्यात्मिक संवाद हुआ।

व्यासजी ने गृहस्थ धर्म, संस्कार और पुत्रधर्म का महत्व बताया, जबकि शुकदेवजी ने समझाया कि केवल बाहरी कर्म, आश्रम या संबंध मुक्ति का कारण नहीं बनते। यदि ऐसा होता तो प्रत्येक गृहस्थ, प्रत्येक पुत्रवान, प्रत्येक वानप्रस्थ या प्रत्येक निर्धन व्यक्ति स्वतः ही मुक्त हो जाता।

उन्होंने स्पष्ट कहा—

"मुक्ति केवल आत्मज्ञान, वैराग्य, निष्काम भक्ति और परमात्मा की अनुभूति से प्राप्त होती है; केवल बाहरी आडंबरों से नहीं।"

कहा जाता है कि जब व्यासजी पुत्र-मोह में उनके पीछे-पीछे वन तक पहुँचे, तब स्वयं वृक्षों ने उत्तर देकर उन्हें समझाया—

"हे महर्षि! कौन किसका पिता और कौन किसका पुत्र? यह संबंध केवल शरीर और वासना तक सीमित है। जीव का वास्तविक और शाश्वत संबंध केवल परमात्मा से है।"

यह सुनकर व्यासजी का मोह दूर हुआ और शुकदेवजी वन में तप एवं समाधि के लिए चले गए।

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने शुकदेवजी को केवल जन्म लेने की अनुमति नहीं दी थी, बल्कि उन्हें यह दिव्य आश्वासन दिया था कि वे संसार में रहते हुए भी माया से अछूते रहेंगे। इसलिए शुकदेवजी जन्म से ही पूर्ण ब्रह्मज्ञानी और जीवन्मुक्त महापुरुष कहलाये..... राधे राधे 

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