श्री शालिग्रामस्तोत्रम् {हिन्दी अर्थ सहित} श्री गणेशाय नमः ॐ शालग्रामाय सर्वेशाय सर्वभूताधिपाय च। त्रिगुणात्माय चक्रस्थ ब्रह्मविद्यावतारिण...
श्री शालिग्रामस्तोत्रम् {हिन्दी अर्थ सहित}
श्री गणेशाय नमः
ॐ शालग्रामाय सर्वेशाय सर्वभूताधिपाय च।
त्रिगुणात्माय चक्रस्थ ब्रह्मविद्यावतारिणे॥
पादजलेन शुद्धाय च सर्वकिल्बिषनाशिने।
मोक्षदाय सर्वलोकस्य जगदेकात्मरूपिणे॥
पंचभूताधाराय च चैतन्यस्वरूपिणे।
ज्ञानवर्धाय आत्माय शक्तिस्वरूपिणे॥
दिव्यलोकप्रदाय सूर्यचन्द्रविवर्णिने।
त्रिविक्रमस्वरूपाय योगेश्वरसमाहिते॥
ध्यानदाय अमृतसिंचन प्राणदाय सदा प्रभो।
सर्वसंकटनाशाय सौभाग्यप्रद सर्वदा॥
धनसन्तानप्रदाय च अक्षरस्वरूपिणे।
निर्विकल्पाय अनंताय परमब्रह्मस्वरूपिणे॥
त्रैलोक्यविनायकाय मोक्षदाय च सततं।
चैतन्यमयी शक्त्यात्मा सम्पूर्णशक्तिसंपदा॥
सर्वशक्तिमयी दिव्यगति जगतांत्रिक तत्त्वदा।
सार्वभौमाय सर्वव्यापि विश्वरूपाय महात्मने॥
अनाहतस्वरूपाय निर्विकाराय शाश्वते।
परमात्मनाय सततप्रकाश महाव्यापिने॥
भक्तानां सर्वसुखदाय रत्नसंपन्न संप्रदा।
कामसिद्धि, ज्ञानसिद्धि, मोक्षसिद्धिदातारं॥
अनंतसत्वस्वरूपाय सर्वदेवतया प्रभो।
जगत्प्रवर्तक विश्वेश, शालग्रामाय नमो नमः॥
👉हिंदी भावार्थ
शालग्राम भगवान, जो समस्त प्राणियों के अधिपति हैं, त्रिगुणात्मक हैं, सुदर्शन चक्र में स्थित, सर्वोच्च ब्रह्मविद्या के स्वरूप हैं, उनके चरणों से सब पापकर्म शुद्ध होते हैं।
वे मोक्षदाता, जगत के एकात्मस्वरूप, पंचभूतों के अधिकारी, चैतन्यस्वरूप, ज्ञानवर्द्धक, आत्मस्वरूप, और शक्ति के आधार हैं।
वे दिव्य लोकों को देने वाले, सूर्य-चन्द्र के जैसा तेज, त्रिविक्रम के रूप में प्रकट, योगेश्वर, समाधिस्वरूप, ध्यानदायक व अमृत देने वाले हैं।
संकटनाशक, सौभाग्यप्रद, धन व संतान देने वाले, अक्षर व निर्विकल्प स्वरूप, अनंत व परमब्रह्म, तीनों लोकों के विनायक, चैतन्यपूर्ण, सम्पूर्ण शक्तियों के स्वामी हैं।
दिव्य गति देने वाले, जगतः तांत्रिक तत्त्वस्वरूप, सार्वभौम, सर्वव्यापी, विश्वरूप, अनाहत व निर्विकारी, शाश्वत, परमात्मा हैं।
भक्तों को संपूर्ण सुख देने वाले, रत्नों से परिपूर्ण, काम, ज्ञान और मोक्ष सिद्धि देने वाले, समस्त देवताओं के स्वरूप, विश्व के प्रवर्तक श्री शालग्राम को नमस्कार है।
🔶🔶 अथ श्री शालग्रामस्तोत्रम् 🔶🔶
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श्रीरामं सह लक्ष्मणं सकरुणं सीतान्वितं सात्त्विकं
वैदेहीमुखपद्मलुब्धमधुपं पौलस्त्वसंहारिणम् ।
वन्दे वन्द्यपदांबुजं सुरवरं भक्तानुकंपाकरं
शत्रुघेन हनूमता च भरतेनासेवितं राघवम् ॥
अर्थ:
मैं उस राघव (श्रीराम) को वन्दन करता हूँ, जो लक्ष्मण के साथ हैं, स्नेहशील और सीता के साथ युक्त हैं, जो सात्त्विक हैं, वैदेही के कमल सदृश चरणों के भूखे मधु-पापों का संहार करने वाले हैं। वे देवों के प्रिय हैं, भक्तों के प्रति करुणामय हैं, शत्रुओं को हरने वाले हैं और हनुमान तथा भरत की सेवा से पूजित हैं।
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जयति जनकपुत्री लोकभर्त्री नितान्तं
जयति जयति रामः पुण्यपुञ्जस्वरूपः ।
जयति शुभगराशिर्लक्ष्मणो ज्ञानरूपो
जयति किल मनोज्ञा ब्रह्मजाता ह्ययोध्या ॥
अर्थ:
वह राम, जो जनक की पुत्री सीता के पति हैं और सम्पूर्ण लोक के पालनकर्ता हैं, उनका जय हो। जो पुण्य के संचय स्वरूप हैं। लक्ष्मण, जो शुभ और ज्ञान रूप हैं, उनका भी जय हो। हे सुन्दर और मनोहर, ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न और अयोध्या में स्थित, उनका जय हो।
🍁 (युधिष्ठिर उवाच)
श्रीदेवदेव देवेश देवतार्चनमुत्तमम् ।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि ब्रूहि मे पुरुषोत्तम ॥१
अर्थ:
हे पुरुषोत्तम! मैं यह जानना चाहता हूँ कि देवों के देव, श्रेष्ठ देवतार्चना की विधि क्या है। कृपया मुझे इसका वर्णन करें।
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गण्डक्यां चोत्तरे तीरे गिरिराजस्य दक्षिणे ।
दशयोजनविस्तीर्णा महाक्षेत्रवसुन्धरा ॥२
अर्थ:
गिरिराज के दक्षिण में, गंडक नदी के उत्तरी तट पर, दस योजना विस्तृत इस विशाल भूमि (महाक्षेत्र) में शालग्राम स्थित है।
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शालग्रामो भवेद्देवो देवी द्वारावती भवेत् ।
उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः ॥३
अर्थ:
जहाँ शालग्राम और द्वारावती (देवी) एक साथ स्थित हैं, वहाँ मोक्ष निश्चित रूप से प्राप्त होता है।
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शालग्रामशिला यत्र यत्र द्वारावती शिला ।
उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः ॥४
अर्थ:
जहाँ-जहाँ शालग्राम और द्वारावती शिला एकसाथ हैं, वहाँ मोक्ष प्राप्ति में कोई संदेह नहीं है।
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आजन्मकृतपापानां प्रायश्चित्तं य इच्छति ।
शालग्रामशिलावारि पापहारि नमोऽस्तु ते ॥५
अर्थ:
जो व्यक्ति अपने आजन्म किए पापों का प्रायश्चित्त करना चाहता है, वह शालग्राम शिला की पूजा करके अपने पापों से मुक्ति प्राप्त करता है।
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अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् ।
विष्णोः पादोदकं पीत्वा शिरसा धारयाम्यहम् ॥६
अर्थ:
शालग्राम के पादोदक (पादजल) को पीकर सिर पर धारण करने से अकाल मृत्यु और सभी प्रकार की व्याधियों का नाश होता है।
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शङ्खमध्ये स्थितं तोयं भ्रामितं केशवोपरि ।
अङ्गलग्नं मनुष्याणां ब्रह्महत्यादिकं दहेत् ॥७
अर्थ:
यदि कोई मनुष्य शंख मध्य में स्थित जल को केशव (भगवान विष्णु) पर लगाकर स्नान करता है, तो यह ब्रह्महत्या जैसे महान पापों को नष्ट करता है।
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स्नानोदकं पिवेन्नित्यं चक्राङ्कितशिलोद्भवम् ।
प्रक्षाल्य शुद्धं तत्तोयं ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥८
अर्थ:
जो व्यक्ति नित्य स्नानजल में चक्रांकित शिला को देख कर स्नान करता है और जल से शुद्ध होता है, उसके सभी पाप (ब्राह्महत्या आदि) नष्ट हो जाते हैं।
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अग्निष्टोमसहस्राणि वाजपेयशतानि च ।
सम्यक् फलमवाप्नोति विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात् ॥९
अर्थ:
अग्निष्टोम और वाजपेय जैसे यज्ञ हजारों बार करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल व्यक्ति को शालग्राम के नैवेद्य से प्राप्त होता है।
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नैवेद्ययुक्तां तुलसीं च मिश्रितां विशेषतः पादजलेन विष्णोः ।
योऽश्नाति नित्यं पुरतो मुरारेः प्राप्नोति यज्ञायुतकोटिपुण्यम् ॥१०
अर्थ:
जो व्यक्ति तुलसी से मिश्रित शालग्राम का पादजल नियमित रूप से ग्रहण करता है, वह मुरारी (भगवान कृष्ण/विष्णु) के सामने हजारों यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त करता है।
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खण्डिताः स्फुटिता भिन्ना वह्निदग्धास्तथैव च ।
शालग्रामशिला यत्र तत्र दोषो न विद्यते ॥११
अर्थ:
भले ही शालग्राम की शिला खंडित या जली हुई हो, वहाँ किसी प्रकार का दोष नहीं होता।
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न मन्त्रः पूजनं नैव न तीर्थं न च भावना ।
न स्तुतिर्नोपचारश्च शालग्रामशिलार्चने ॥१२
अर्थ:
शालग्राम की पूजा में कोई विशेष मंत्र, तीर्थ या भाव की आवश्यकता नहीं है।
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ब्रह्महत्यादिकं पापं मनोवाक्कायसम्भवम् ।
शीघ्रं नश्यति तत्सर्वं शालग्रामशिलार्चनात् ॥१३
अर्थ:
ब्रह्महत्या जैसे बड़े पाप भी, जो मन, वाक् और शरीर से उत्पन्न हुए हों, शालग्राम शिला की पूजा से शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
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नानावर्णमयं चैव नानाभोगेन वेष्टितम् ।
तथा वरप्रसादेन लक्ष्मीकान्तं वदाम्यहम् ॥१४
हिंदी अर्थ:
शालग्राम विभिन्न रंगों और भोगों से परिपूर्ण होते हैं। इसके वरप्रसाद द्वारा लक्ष्मी-कान्ति (सौभाग्य) प्राप्त होती है।
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नारायणोद्भवो देवश्चक्रमध्ये च कर्मणा ।
तथा वरप्रसादेन लक्ष्मीकान्तं वदाम्यहम् ॥१५
अर्थ:
नारायण (भगवान विष्णु) के उत्पत्ति और कर्म चक्र मध्य में होने के कारण, शालग्राम की पूजा से लक्ष्मी-कान्ति (सौभाग्य) प्राप्त होती है।
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कृष्णे शिलातले यत्र सूक्ष्मं चक्रं च दृश्यते ।
सौभाग्यं सन्ततिं धत्ते सर्व सौख्यं ददाति च ॥१६
अर्थ:
शालग्राम की शिला के तल पर सूक्ष्म चक्र देखने को मिले, वहाँ का पूजन करने से संतान सुख, सौभाग्य और सम्पूर्ण सुख प्राप्त होता है।
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वासुदेवस्य चिह्नानि दृष्ट्वा पापैः प्रमुच्यते ।
श्रीधरः सुकरे वामे हरिद्वर्णस्तु दृश्यते ॥१७
अर्थ:
वासुदेव (कृष्ण) के चिह्नों को देखकर व्यक्ति अपने पापों से मुक्त हो जाता है। श्रीधर का रूप सुकर्म करने वाले के बाएँ दिखता है और हरिद्वर्ण (हरी वर्ण) का रूप भी वहाँ प्रकट होता है।
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वराहरूपिणं देवं कूर्माङ्गैरपि चिह्नितम् ।
गोपदं तत्र दृश्येत वाराहं वामनं तथा ॥ १८॥
वराह रूप वाले देव, कूर्म आदि अंगों से चिन्हित हैं। गोपद (गोमुख) में वराह और वामन रूप भी दिखाई देते हैं।
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पीतवर्णं तु देवानां रक्तवर्णं भयावहम् ।
नारसिंहो भवेद्देवो मोक्षदं च प्रकीर्तितम् ॥ १९॥
देवताओं का पीतवर्ण (सुनहरा) होता है और उनका रक्तवर्ण भय उत्पन्न करता है। नारसिंह देव मोक्ष देने वाले रूप में दिखाई देते हैं।
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शङ्खचक्रगदाकूर्माः शङ्खो यत्र प्रदृश्यते ।
शङ्खवर्णस्य देवानां वामे देवस्य लक्षणम् ॥ २०॥
शंख, चक्र, गदा और कूर्म – यह सभी चिन्ह शालग्राम शिला में दिखाई देते हैं। शंखवर्ण वाले देव वाम दिशा में दिखाई देते हैं।
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दामोदरं तथा स्थूलं मध्ये चक्रं प्रतिष्ठितम् ।
पूर्णद्वारेण सङ्कीर्णा पीतरेखा च दृश्यते ॥ २१॥
दामोदर और स्थूल रूप मध्य में प्रतिष्ठित हैं। पूर्ण द्वारों से घिरे पीतरेखा (सुनहरे रेखा) भी दिखाई देती है।
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छत्राकारे भवेद्राज्यं वर्तुले च महाश्रियः ।
चिपिटे च महादुःखं शूलाग्रे तु रणं ध्रुवम् ॥ २२॥
छत्राकार आकृति राज्य (सत्ता) दर्शाती है। वर्तुल (चक्राकार) रूप में महाश्री दिखाई देती है। शूल के अग्रभाग में रण और संघर्ष भी प्रतीत होते हैं।
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ललाटे शेषभोगस्तु शिरोपरि सुकाञ्चनम् ।
चक्रकाञ्चनवर्णानां वामदेवस्य लक्षणम् ॥ २३॥
ललाट पर शेषभोग (सर्पो का आधार) और सिर पर सुगंधित सुवर्ण दिखाई देता है। चक्रकाञ्चनवर्ण वामदेव के लक्षण हैं।
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वामपार्श्वे च वै चक्रे कृष्णवर्णस्तु पिङ्गलम् ।
लक्ष्मीनृसिंहदेवानां पृथग्वर्णस्तु दृश्यते ॥ २४॥
वामपार्श्व और चक्र में कृष्णवर्ण पिंगल के रूप में दिखाई देता है। लक्ष्मीनृसिंह के देवताओं का पृथक रूप भी स्पष्ट होता है।
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लम्बोष्ठे च दरिद्रं स्यात्पिङ्गले हानिरेव च ।
लग्नचक्रे भवेद्याधिर्विदारे मरणं ध्रुवम् ॥ २५॥
लम्बोष्ठे पर दरिद्र दिखाई देता है, पिंगल में हानि होती है। चक्र में यधि विदार (घात) और मृत्यु का संकेत है।
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पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके धारयेत्सदा ।
विष्णोर्द्दष्टं भक्षितव्यं तुलसीदलमिश्रितम् ॥ २६॥
पादजल शुद्ध रूप से सिर पर धारण करना चाहिए। विष्णु का पादजल आठ बार पीना चाहिए, तुलसी के पत्तों के साथ।
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कल्पकोटिसहस्राणि वैकुण्ठे वसते सदा ।
शालग्रामशिलाबिन्दुर्हत्याकोटिविनाशनः ॥ २७॥
कल्पकोटि-हजारों वर्ष तक वैकुण्ठ में शालग्राम शिला वास करती है। शिला के बिंदु से हजारों प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं।
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तस्मात्सम्पूजयेद्ध्यात्वा पूजितं चापि सर्वदा ।
शालग्रामशिलास्तोत्रं यः पठेच्च द्विजोत्तमः ॥ २८॥
इसलिए शालग्राम शिला की पूजा और ध्यान निरंतर करना चाहिए। जो द्विज (ब्राह्मण) इसे पढ़ता है, वह शुभ फल पाता है।
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स गच्छेत्परमं स्थानं यत्र लोकेश्वरो हरिः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ २९॥
वह परम स्थान प्राप्त करता है, जहाँ लोकनाथ हरि स्थित हैं। सभी पाप से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
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दशावतारो देवानां पृथग्वर्णस्तु दृश्यते ।
ईप्सितं लभते राज्यं विष्णुपूजामनुक्रमात् ॥ ३०॥
शालग्राम में दशावतार के देव भी विभिन्न रंगों में दिखाई देते हैं। जो व्यक्ति इसे पूजता है, वह इच्छित राज्य प्राप्त करता है।
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कोट्यो हि ब्रह्महत्यानामगम्यागम्यकोटयः ।
ताः सर्वा नाशमायान्ति विष्णुनैवेद्यभक्षणात् ॥ ३१॥
करोड़ों ब्रह्महत्या करने वाले पाप भी शालग्राम के नैवेद्य (भोग) से नष्ट हो जाते हैं।
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विष्णोः पादोदकं पीत्वा कोटिजन्माघनाशनम् ।
तस्मादष्टगुणं पापं भूमौ बिन्दुनिपातनात् ॥ ३२॥
विष्णु के पादजल का सेवन करने से करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिए भूमि पर आठ बार बिंदु गिराने पर भी पाप नष्ट होते हैं।
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रघुवर! यदभूस्त्वं तादृशो वायसस्य
प्रणत इति दयालुर्यस्य चैद्यस्य कृष्ण! ।
प्रतिभवमपराद्धुर्मुग्धसायुज्यदोभूर्-
वद किमु पदमागस्तस्य तेऽस्तिक्षमायाः ॥ १॥
अर्थ
हे रघुवर! यदि कोई तुम्हें प्रणाम करता है, तो वह दया और कृपा से तुम्हारा प्रिय बनता है। हे कृष्ण! उसके पाप क्षमायोग्य बन जाते हैं।
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मह्यं मनः फलमिदं मधुकैटभारे
मत्प्रार्थनीय मदनुग्रह एष एव ।
त्वद्भृत्यभृत्यपरिचारकभृत्यभृत्य-
भृत्यस्य भृत्य इति मां स्मर लोकनाथ ॥ २॥
अर्थ
. मेरे लिए यह मंत्र अत्यंत फलदायी है। हे लोकनाथ! अपने भक्तों की सेवा करने वाले, स्वयं भक्त की भक्ति में लीन रहने वाले को स्मरण करो।
। इति श्रीभविष्योत्तरपुराणे श्रीकृष्णयुधिष्ठिरसंवादे शालग्रामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।



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