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कब “हाँ” और कब “न” — यही जीवन की कला है

  कब “हाँ” और कब “न” — यही जीवन की कला है “न” का अर्थ केवल नहीं नहीं है। कई बार “न” हमारे भीतर की हीनता का प्रतीक बन जाता है— और “हाँ” केवल ...

 

कब “हाँ” और कब “न” — यही जीवन की कला है

“न” का अर्थ केवल नहीं नहीं है।

कई बार “न” हमारे भीतर की हीनता का प्रतीक बन जाता है—

और “हाँ” केवल सहमति नहीं, बल्कि पूर्णता का संकेत होती है।

लेकिन बात इतनी सरल भी नहीं है...

“हाँ” पूर्णता है—दूसरों की।

और “न ” अपूर्णता भी है—दूसरों की।

इसलिए असली प्रश्न यह नहीं कि

हाँ कब कहनी है और न कब?

असली प्रश्न है—

किसकी “हाँ” स्वीकार करनी है और किसकी “न” को समझना है?

जीवन में जितनी “हाँ” आवश्यक है,

उतनी ही “न” की भी आवश्यकता है।

जिसे हर बात पर “हाँ” कहना आता है,

वह धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो देता है।

और जो हर बात पर “न” कहता है,

वह जीवन के अवसर खो देता है।

इसलिए—

जितनी “हाँ” चाहिए,

उतनी ही लंबी साँस लो।

और जब “न” कहना आवश्यक हो,

तो उसे दीर्घ मत करो—शीघ्र ग्रहण करो।

क्योंकि सही समय पर कही गई “न”

आपको अनेक गलत रास्तों से बचा सकती है।

और सही समय पर कही गई “हाँ”

आपको जीवन की अनेक ऊँचाइयों तक पहुँचा सकती है।

हाँ और न के बीच संतुलन ही सद्जीवन है।

न हर बात में झुकना है,

न हर बात में अकड़ना है।

जहाँ सत्य हो वहाँ हाँ,

जहाँ असत्य हो वहाँ न।

जहाँ धर्म हो वहाँ हाँ,

जहाँ अधर्म हो वहाँ न

और जहाँ निर्णय आपका अपना हो,

वहाँ दूसरों की “हाँ” और “न” से अधिक

अपने विवेक की आवाज़ सुनना है।

यही जीवन की साधना है—

कब “हाँ” और कब “न”,

यही मनुष्य की पहचान है।


— पूरन पंडित

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