आरक्षण, समानता और राजनीति — असली सवाल क्या है — पूरन पंडित भाइयों और बहनों, आज मैं एक ऐसे विषय पर बात करना चाहता हूँ, जिस पर बात करते ही समा...
आरक्षण, समानता और राजनीति — असली सवाल क्या है
— पूरन पंडित
भाइयों और बहनों,
आज मैं एक ऐसे विषय पर बात करना चाहता हूँ, जिस पर बात करते ही समाज दो हिस्सों में बँट जाता है—आरक्षण!
लेकिन मेरा सवाल है—
क्या हमने कभी आरक्षण को उसके मूल उद्देश्य से समझने की कोशिश की है?
आरक्षण का उद्देश्य किसी को हमेशा के लिए पीछे रखना नहीं था और न ही किसी को हमेशा के लिए आगे करना था।
उस समय देश आजाद हुआ था। सदियों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विषमताएँ थीं। अंग्रेजों की नीतियों और जमींदारी व्यवस्था ने भी समाज के बड़े वर्गों को आर्थिक रूप से कमजोर किया था।
ऐसे समय में विचार यह था कि—
जो समाज पीछे रह गया है, उसे कुछ समय तक विशेष सहारा दिया जाए, शिक्षा मिले, अवसर मिले, सम्मान मिले और वह मुख्यधारा के साथ बराबरी से खड़ा हो सके।
यानी आरक्षण को बैसाखी नहीं, सहारा माना गया था।
सोचिए...
अगर किसी व्यक्ति को नदी पार करनी है और वह कमजोर है, तो उसे नाव में बैठाकर पार कराया जाता है।
लेकिन क्या नाव जिंदगी भर साथ चलती है?
नहीं!
नदी पार होने के बाद आदमी अपने पैरों पर चलता है।
यही बात हमें आरक्षण और सामाजिक विकास के संदर्भ में भी समझनी होगी।
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आजादी को सात दशक से अधिक समय बीत चुका है।
देश बदला है।
आज देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक वंचित और आदिवासी समाज से आने वाले लोग पहुँचे हैं। प्रधानमंत्री पद तक पिछड़े वर्ग से आने वाला व्यक्ति पहुँचा है। संसद, विधानसभाओं, प्रशासन और सरकारी संस्थानों में विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी है।
तो फिर हमें एक बार रुककर पूछना चाहिए—
क्या आज भी हमारी नीति वही होनी चाहिए जो आजादी के समय थी?
या समय के साथ उसकी समीक्षा भी होनी चाहिए?
यह सवाल किसी जाति के खिलाफ नहीं है।
यह सवाल है—
क्या वास्तव में लाभ उस व्यक्ति तक पहुँच रहा है जिसे इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है?
क्योंकि आज गरीबी केवल एक जाति में नहीं है।
गरीब हर समाज में है।
किसी के पास जाति का नाम है, लेकिन पेट में रोटी नहीं।
किसी के पास प्रमाणपत्र है, लेकिन बच्चे की फीस भरने के पैसे नहीं।
और दूसरी तरफ उसी सामाजिक वर्ग में ऐसे लोग भी हैं जो पीढ़ियों से शिक्षा, नौकरी और आर्थिक साधन प्राप्त कर चुके हैं।
तो क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि—
जिसे वास्तव में आवश्यकता है, उसे अवसर मिले?
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अब एक और बात समझिए।
भारत का संविधान हर वयस्क नागरिक को अपने जीवन के अनेक व्यक्तिगत निर्णयों की स्वतंत्रता देता है।
विवाह किससे करना है, क्या खाना है, किस पद्धति से पूजा करनी है—इन व्यक्तिगत विषयों में नागरिक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, बशर्ते कानून का पालन हो।
सरकारी कर्मचारी से अपेक्षा है कि वह किसी नागरिक के साथ जाति, धर्म या पंथ के आधार पर भेदभाव न करे।
लेकिन व्यक्तिगत जीवन में संविधान नागरिकों को अपनी आस्था और उपासना की स्वतंत्रता देता है।
यही तो भारत की खूबसूरती है—विविधता के बीच स्वतंत्रता और समान अधिकार।
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लेकिन भाइयों और बहनों,
अब असली प्रश्न राजनीति का है।
जब समाज में समानता बढ़ती है, जब लोग आपस में जुड़ते हैं, जब जाति की दीवारें कमजोर होती हैं—
तो राजनीति के लिए जाति के नाम पर लोगों को बाँटना कठिन हो जाता है।
और राजनीति में सबसे आसान तरीका क्या है?
किसी एक को दोषी बताओ और बाकी सबको उसके खिलाफ खड़ा कर दो!
कभी जाति के नाम पर...
कभी धर्म के नाम पर...
कभी क्षेत्र के नाम पर...
कभी गरीब-अमीर के नाम पर...
और जनता?
जनता आपस में लड़ती रहती है।
और नेता?
राजनीति करते रहते हैं।
यही सबसे बड़ा खतरा है।
क्योंकि अगर गरीब को यह समझ आ जाए कि उसकी समस्या केवल दूसरी जाति का गरीब नहीं है...
अगर पिछड़े को यह समझ आ जाए कि उसके संघर्ष का समाधान केवल किसी जाति के खिलाफ खड़े होने में नहीं है...
अगर हर नागरिक यह समझ जाए कि गरीबी की कोई जाति नहीं होती और अवसर की कोई जाति नहीं होनी चाहिए...
तो समाज को बाँटना बहुत कठिन हो जाएगा।
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आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि—
“तुम किस जाति के हो?”
प्रश्न होना चाहिए—
“तुम्हारे पास अवसर है या नहीं?”
तुम्हारे बच्चे पढ़ पा रहे हैं या नहीं?
तुम्हारे घर में रोजगार है या नहीं?
तुम्हें आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है या नहीं?
क्योंकि गरीब अगर गरीब है तो वह गरीब है—चाहे उसकी जाति कुछ भी हो।
और अमीर अगर अमीर है तो वह अमीर है—चाहे उसकी जाति कुछ भी हो।
गरीबी को जाति के चश्मे से देखना भी एक तरह की राजनीति है।
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मैं किसी वर्ग से उसका अधिकार छीनने की बात नहीं कर रहा।
मैं केवल इतना कह रहा हूँ—
नीति ऐसी हो कि उसका लाभ सबसे जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुँचे।
समीक्षा हो।
आँकड़ों के आधार पर हो।
ईमानदारी से हो।
और सबसे महत्वपूर्ण—
समाज को जोड़ने वाली हो, तोड़ने वाली नहीं।
क्योंकि आरक्षण का अंतिम लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि समाज हमेशा आरक्षित और अनारक्षित में बँटा रहे।
अंतिम लक्ष्य होना चाहिए—
एक ऐसा समाज जहाँ हर बच्चे को शिक्षा मिले, हर योग्य व्यक्ति को अवसर मिले और हर नागरिक सम्मान के साथ सिर उठाकर जी सके।
और अगर हम उस दिन तक पहुँच गए—
तो समझिए कि हमने संविधान की भावना को समझ लिया।
जाति के नाम पर लड़ना बंद करो।
गरीबी और अवसर की असमानता के खिलाफ लड़ो।
एक-दूसरे के खिलाफ नहीं—व्यवस्था की कमियों के खिलाफ लड़ो।
क्योंकि...
देश तब मजबूत होगा जब पहचान पूछने से पहले इंसान देखा जाएगा।
यही समानता है।
यही सामाजिक न्याय है।
और यही सच्चे विकास का रास्ता है।
— पूरन पंडित



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