प्रश्न -कुछ सामाजिक संगठनों व राजनैतिक दलों द्वारा मनुस्मृति में महिलाओं की स्थिति के सम्बम्ध में समाज में भ्रम फैलाया जा रहा है । कृपया ...
प्रश्न -कुछ सामाजिक संगठनों व राजनैतिक दलों द्वारा मनुस्मृति में महिलाओं की स्थिति के सम्बम्ध में समाज में भ्रम फैलाया जा रहा है । कृपया इस विषय में वास्तविक स्थिति का बोध कराएं ?
उत्तर - महर्षि मनु अपने ग्रन्थ मनुस्मृति में महिलाओं के विषय विधान करते हुए लिखते हैं कि
1. स्त्रियों का सम्मान -
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥ मनु.3.56
अर्थ: जहाँ स्त्रियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न होते हैं; और जहाँ उनका सम्मान नहीं किया जाता, वहाँ सभी की गई क्रियाएं निष्फल होती हैं ।
2. स्त्रियों का दुःख और परिवार -
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा॥ मनु. 3.57
अर्थ: जिस कुल में स्त्रियाँ दुःखी रहती हैं, वह शीघ्र नष्ट हो जाता है; और जिस कुल में वे दुःखी नहीं रहतीं, वह सदैव उन्नति करता है।
3. स्त्रियों का अपमान -
जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः।
तानि कृत्याहतान्येव विनश्यन्ति समन्ततः॥ मनु. 3.58
अर्थ: जिन घरों में स्त्रियाँ उचित सम्मान न मिलने के कारण दुःखी होकर शाप देती हैं, वे घर चारों ओर से उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे किसी विनाशकारी कर्म से नष्ट किए गए हों।
4. स्त्रियों का सत्कार -
तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः।
भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च॥ मनु. 3.59
अर्थ: परिवार की उन्नति चाहने वाले पुरुषों को स्त्रियों का सदैव सम्मान करना चाहिए तथा वस्त्र, आभूषण और भोजन आदि से उनका सत्कार करना चाहिए।
5. पति-पत्नी की प्रसन्नता -
सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम्॥ मनु 3.60
अर्थ: जिस कुल में पति अपनी पत्नी से और पत्नी अपने पति से संतुष्ट रहते हैं, उस कुल में निश्चित रूप से कल्याण बना रहता है।
6. स्त्री की प्रसन्नता और परिवार -
स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद्रोचते कुलम्।
तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते॥ मनु. 3.62
अर्थ: जिस स्त्री के प्रसन्न रहने से परिवार में प्रसन्नता रहती है, वहाँ सब कुछ अच्छा लगता है; और उसके अप्रसन्न रहने पर परिवार में सब कुछ अच्छा नहीं लगता।
इस प्रकार हम देखते हैं कि उपर्युक्त सभी श्लोकों में स्री को पूज्य अर्थात् आदर के योग्य बताया गया है व इनकी प्रसन्नता में ही घर व कुल का सुख व समृद्धि बताई गई है ।
एक अन्य श्लोक जिसका कथन आरोप लगाने वाले लोग मनुस्मृति में महिलाओं की स्थिति के विषय में भ्रम फैलाने के लिए करते हैं अब उस पर विचार करते हैं -
स्त्री की सुरक्षा -
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥ मनु. 9.3
अर्थ: बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र की सुरक्षा में स्त्री को रहना चाहिए स्वतन्त्ररुप से नहीं ।
इस श्लोक की व्याख्या ये लोग ‘स्त्री को दबाकर रखने’ ‘परतन्त्र रखने’ आदि के रुप में व्करते हैं परन्तु ऐसा मानना सही नहीं है क्योंकि यदि स्त्री को दबाकर रखना ही मनु का अभिप्राय होता तो वे उनकी स्तुति में उपरोक्त श्लोक कभी न लिखते । किसी को आदर सत्कार देना व उसको दबाकर रखना ये दोनों एक-दूसरे के विपरीत बातें हैं जिनका एक साथ होना सम्भव नहीं है इसलिए मनु के इस कथन का यही अभिप्राय समझा जाना चाहिए कि उन्होनें यह व्यवस्था स्त्रियों के सामाजिक व पारिवारिक संरक्षण व सुरक्षा की दृष्टि से दी है जिस संरक्षण व सुरक्षा का दिया जाना समाज व परिवार का सार्वकालिक दायित्व बनता भी है ।
अत: इस विषय में यही समझना चाहिए कि महर्षि मनु ने जो भी सामाजिक व्यवस्थाएं बनाई हैं वे पुरुष,स्त्री,बालक,वृद्ध आदि सभी प्रकार के लोगों के हित को दृष्टि में रखकर बनाई हैं जिनका हमें अनुकरण करना चाहिए ।
इस विषय में एक अन्य तथ्य जिसे जानना आवश्यक है वह यह कि अर्वाचीन समय में हमारे कुछ तथाकथित धर्माचार्यों के द्वारा अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए कुछ धर्म विरुद्ध सामग्री भी हमारे शास्त्रों में प्रक्षिप्त कर दी गई अर्थात् मिला दी गई जिसे मनु रचित मनुस्मृति व अन्य शास्त्रों से बाहर रखकर देखा जाना चाहिए तभी हम मनु आदि शास्त्रकारों द्वारा रचित शास्त्रों का सही प्रकार से बोध कर पाएगें ।



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