धर्म क्या है- धर्म किसी अखाड़े की संपत्ति नहीं है, किसी मठ की सीमा में बंधा हुआ नहीं है, किसी पंथ, समुदाय या व्यक्ति द्वारा स्वीकार अथवा अस्...
धर्म क्या है-
धर्म किसी अखाड़े की संपत्ति नहीं है, किसी मठ की सीमा में बंधा हुआ नहीं है, किसी पंथ, समुदाय या व्यक्ति द्वारा स्वीकार अथवा अस्वीकार कर देने से समाप्त नहीं होता।
धर्म एक सनातन धारणा है।
धर्म जीवन है, धर्म शांति है और धर्म प्रत्येक जीव को जीने का अधिकार देने वाली व्यवस्था है। जड़ हो या चेतन, मनुष्य हो या अन्य कोई जीव—प्रकृति में प्रत्येक के जीवन को धारण करने वाले कुछ नियम हैं। इन्हीं नियमों को हम धर्म, विधान या कर्तव्य के रूप में समझते हैं।
जिस समुदाय ने अपने जीवन-मूल्यों की स्मृति सुरक्षित रखी, अपने नियम बनाए और उन नियमों के पालन की व्यवस्था की—वही समुदाय अपनी पहचान को लंबे समय तक जीवित रख सका। इसलिए अलग-अलग समुदायों ने अपने-अपने स्मृति-ग्रंथ, विधान और संविधान बनाए।
कोई हिंदू है, कोई मुस्लिम, कोई सिख, कोई बौद्ध, कोई जैन, कोई पारसी, कोई ईसाई; कोई गुरु-मार्गी है, कोई पंथी है, कोई किसी ग्रंथ को अपना मार्गदर्शक मानता है।
लेकिन यहाँ एक बात समझने की आवश्यकता है—
पंथ का पालन और धर्म का पालन एक ही बात नहीं है।
पंथ किसी विशेष मार्ग, परंपरा या समुदाय की व्यवस्था हो सकता है; जबकि धर्म उससे कहीं व्यापक है। जब कोई पंथ धर्म के मूल सिद्धांतों के अनुकूल चलता है, तब वह धर्म का सहायक बनता है। और जब कोई व्यक्ति या पंथ धर्म के मूल गुणों के विपरीत आचरण करता है, तो उसका आचरण धर्मसम्मत नहीं कहा जा सकता।
इसीलिए हमारे यहाँ कहा गया—
जो धर्म के अनुकूल चलता है, वह पुण्य के मार्ग पर चलता है; और जो धर्म के विपरीत चलता है, वह पाप की ओर जाता है।
अब प्रश्न उठता है—
पहचानें कैसे कि व्यक्ति धार्मिक है या अधार्मिक?
केवल उसके वस्त्र देखकर नहीं।
केवल उसकी जाति, समुदाय या पंथ देखकर नहीं।
केवल उसके माथे के तिलक, हाथ की माला या उसके द्वारा लिए गए किसी नाम से भी नहीं।
धर्म व्यक्ति के आचरण में दिखाई देना चाहिए।
किसी व्यक्ति में धर्म के ये लक्षण दिखाई देने चाहिए—
1. सत्य
सबसे पहले उसके आचरण में सत्य दिखाई दे। वह पाखंडी न हो। उसके शब्द और कर्म में बहुत बड़ा अंतर न हो।
2. अहिंसा और करुणा
उसके भीतर प्रेम हो, दया हो, सेवा का भाव हो। वह जड़-चेतन, जीव-जगत और जीवन के प्रति संवेदनशील हो।
3. इन्द्रिय-निग्रह
वह अपनी इच्छाओं और इन्द्रियों का दास न हो। स्वयं पर नियंत्रण रखना जाने।
4. अस्तेय
जो उसका नहीं है, उसे लेने की इच्छा न रखे। दूसरे के अधिकार और संपत्ति का सम्मान करे।
5. धैर्य
विपरीत परिस्थितियों में भी अपना विवेक और मर्यादा न छोड़े। सुख में उछले नहीं और दुःख में टूटे नहीं।
6. श्रद्धा
उसके भीतर अपने सत्य, सदाचार, गुरुजन, श्रेष्ठ परंपरा और जीवन-मूल्यों के प्रति श्रद्धा हो।
7. ईश्वर में विश्वास
उसके भीतर यह भाव हो कि संसार केवल मेरे स्वार्थ के लिए नहीं है; मेरे कर्मों का भी कोई उत्तरदायित्व है और मेरे ऊपर एक परम सत्ता का विधान है।
इसलिए किसी को केवल इसलिए धार्मिक मत मानिए कि वह किसी विशेष पंथ से जुड़ा हुआ है।
धर्म नाम से नहीं, आचरण से प्रकट होता है।
मनुष्य किस घर में जन्मा, किस समुदाय में पैदा हुआ, किस पंथ को मानता है—यह उसकी पहचान हो सकती है।
लेकिन—
उसके भीतर सत्य कितना है, करुणा कितनी है, संयम कितना है, धैर्य कितना है, श्रद्धा कितनी है और ईश्वर के प्रति विश्वास कितना है—यही उसके धार्मिक होने की वास्तविक परीक्षा है।
क्योंकि पंथ मनुष्य को एक मार्ग देता है, लेकिन धर्म मनुष्य को जीवन जीने का विवेक देता है।
धर्म को पहचानना हो तो व्यक्ति का परिचय मत पूछिए—उसका आचरण देखिए।
— पं. पूरन मिश्र जी महाराज



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