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स्वयं पूजा करने का तरीका आता है क्या?

  स्वयं पूजा करने का तरीका आता है क्या? बंधुओ! आज मैं आपसे एक बहुत सीधा सवाल पूछना चाहता हूँ— आप मंदिर तो चले जाते हैं… लेकिन क्या आपको पूजा...

 

स्वयं पूजा करने का तरीका आता है क्या?

बंधुओ!

आज मैं आपसे एक बहुत सीधा सवाल पूछना चाहता हूँ—

आप मंदिर तो चले जाते हैं… लेकिन क्या आपको पूजा करने की विधि आती है?

जरा सोचिए!

अगर आपको कोई बीमारी हो जाए और आप अस्पताल पहुँच जाएँ…

तो क्या अस्पताल के अंदर जाकर आप स्वयं ऑपरेशन करने लगेंगे?

क्या डॉक्टर को हटाकर कहेंगे—

“डॉक्टर साहब रहने दीजिए, शरीर मेरा है, ऑपरेशन मैं खुद कर लूँगा!”

नहीं!

क्यों?

क्योंकि आपको मालूम है कि अस्पताल जाना और चिकित्सा करना—दो अलग बातें हैं।

अस्पताल में मशीनें हैं, दवाइयाँ हैं, ऑपरेशन थिएटर है…

लेकिन उसके साथ विधि जानने वाला चिकित्सक भी चाहिए।

ठीक उसी प्रकार—

मंदिर में भगवान हैं, ऊर्जा है, मंत्र हैं, पूजा की सामग्री है…

लेकिन उस ऊर्जा के साथ सही विधि भी चाहिए।

हमारे यहाँ मंदिर केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं है।

वह एक आध्यात्मिक ऊर्जा-केंद्र है।

जैसे बड़े मेडिकल कॉलेज होते हैं, बड़े अस्पताल होते हैं, छोटे क्लिनिक होते हैं—

वैसे ही हमारी परम्परा में अलग-अलग देवालय और साधना-केंद्र रहे हैं।

अब सवाल यह है—

क्या केवल अस्पताल में पहुँच जाने से इलाज हो जाता है?

नहीं!

तो फिर केवल मंदिर में पहुँच जाने से कर्मकांड पूर्ण कैसे हो जाएगा?

हम घंटी बजा देंगे…

फूल चढ़ा देंगे…

जल चढ़ा देंगे…

कुछ मंत्र अपनी सुविधा से बोल देंगे…

और फिर कहेंगे—

“भगवान! अब मेरी पूजा स्वीकार कर लो।”

बंधुओ!

भगवान हमारी भावना अवश्य देखते हैं,

लेकिन कर्मकांड की अपनी विधि और मर्यादा भी होती है।

संकल्प कैसे होगा?

मंत्र कौन-सा होगा?

कितनी बार होगा?

आवाहन कैसे होगा?

पूजन का क्रम क्या होगा?

किस देवता की किस प्रकार उपासना करनी है?

और अंत में कर्म का समापन किस विधि से होगा?

क्या हमें यह सब मालूम है?

अगर नहीं मालूम…

तो समस्या भगवान में नहीं है।

समस्या हमारी अज्ञानता में है।

इसीलिए सनातन परम्परा ने कहा—

जहाँ विधि जटिल हो, जहाँ अनुष्ठान विशेष हो, वहाँ योग्य आचार्य का मार्गदर्शन लो।

आप डॉक्टर से यह नहीं कहते कि

“दवा तो मैं अपनी मर्जी से लूँगा, लेकिन बीमारी ठीक करने की जिम्मेदारी आपकी होगी।”

फिर पूजा में हम ऐसा क्यों करते हैं?

चिकित्सा में हम कहते हैं—

“मुझे विशेषज्ञ चाहिए।”

वास्तु में विशेषज्ञ चाहिए।

कानून में विशेषज्ञ चाहिए।

शिक्षा में गुरु चाहिए।

संगीत में गुरु चाहिए।

तो फिर—

आत्मा और परमात्मा के बीच की साधना में गुरु और आचार्य की आवश्यकता क्यों नहीं होगी?

याद रखिए—

श्रद्धा आपकी हो सकती है,

लेकिन विधि परम्परा की होती है।

भावना आपकी हो सकती है,

लेकिन मंत्र की शुद्धता आवश्यक है।

मंदिर आपका विश्वास हो सकता है,

लेकिन कर्मकांड की मर्यादा शास्त्र की होती है।

इसलिए मेरा उद्देश्य आपको डराना नहीं है…

मेरा उद्देश्य केवल इतना कहना है—

पूजा को केवल एक रस्म मत बनाइए।

पूजा को समझिए।

विधि को जानिए।

और जहाँ आवश्यकता हो, योग्य आचार्य का मार्गदर्शन लीजिए।

क्योंकि—

जिस प्रकार बिना विधि चिकित्सा जोखिमपूर्ण हो सकती है,

उसी प्रकार बिना समझ और विधि के किया गया कर्मकांड अपने उद्देश्य से भटक सकता है।

इसलिए मंदिर जाइए…

श्रद्धा से जाइए…

प्रेम से जाइए…

लेकिन साथ में ज्ञान और विधि भी लेकर जाइए।

क्योंकि—

**भगवान तक पहुँचने के लिए श्रद्धा चाहिए,

और साधना को सही दिशा देने के लिए विधि!**

जय श्री हरि!

जय सनातन!


— पंडित श्री पूरन महाराज

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