बीमारी में शिव का अभिषेक क्यों किया जाता है? बंधुओ! आपने देखा होगा— जब घर में कोई बीमार पड़ता है, तो लोग कहते हैं— “शिवजी का अभिषेक कराइए!” ...
बीमारी में शिव का अभिषेक क्यों किया जाता है?
बंधुओ!आपने देखा होगा—
जब घर में कोई बीमार पड़ता है, तो लोग कहते हैं—
“शिवजी का अभिषेक कराइए!”
लेकिन कभी आपने सोचा है कि शिव अभिषेक ही क्यों?
हमारी परम्परा केवल कर्म नहीं बताती,
उस कर्म के पीछे एक गहरा प्रतीक और दर्शन भी रखती है।
रोग के समय शरीर की चिकित्सा तो चिकित्सक करता है,
लेकिन रोग से लड़ने के लिए व्यक्ति के भीतर हिम्मत, धैर्य और मनोबल भी चाहिए।
और मन का संबंध हमारे ज्योतिषीय दर्शन में चंद्रमा से माना गया है।
चंद्रमा क्या है?
मन!
भावना!
शांति!
धैर्य!
मानसिक स्थिरता!
अब देखिए सनातन परम्परा की अद्भुत प्रतीक-व्यवस्था—
भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है।
अर्थात शिव के मस्तक पर ही चंद्र—मन का प्रतीक—स्थापित है।
इसीलिए जब हम शिव का अभिषेक करते हैं,
तो हमारी भावना केवल शिवलिंग पर जल चढ़ाने की नहीं होती।
हम एक आध्यात्मिक संकल्प करते हैं—
“हे महादेव!
मेरे मन को शांति दीजिए,
मेरे भीतर धैर्य दीजिए,
मेरे मनोबल को मजबूत कीजिए,
ताकि मैं इस कठिन परिस्थिति का सामना कर सकूँ।”
जल क्या करता है?
जल शीतलता का प्रतीक है।
अभिषेक का अर्थ है—
अपने भीतर की अशांति को शीतल करना।
और शिव?
शिव हैं—
संयम, धैर्य, वैराग्य और कल्याण के प्रतीक।
इसलिए बीमारी के समय शिवाभिषेक हमें एक साथ दो बातें याद दिलाता है—
शरीर का उपचार चिकित्सक से कराइए,
और मन को संभालने के लिए श्रद्धा, प्रार्थना और सकारात्मक संकल्प का सहारा लीजिए।
यही हमारी परम्परा का सुंदर संदेश है।
और ध्यान रखिए—
दवा शरीर को संभालती है,
मनोबल व्यक्ति को संभालता है,
और श्रद्धा उसे भीतर से सहारा देती है।
इसलिए जब कोई कहता है—
“बीमारी में शिव का अभिषेक क्यों?”
तो उत्तर है—
क्योंकि हम केवल रोग से मुक्ति की प्रार्थना नहीं करते,
हम उस रोग से लड़ने के लिए मन को भी मजबूत करने की प्रार्थना करते हैं।
शिव के मस्तक पर चंद्रमा है—
और चंद्रमा मन का प्रतीक है।
इसलिए शिव के सामने बैठकर की गई प्रार्थना हमें यही स्मरण कराती है—
**“हे महादेव! शरीर का उपचार अपनी जगह,
लेकिन मेरा मन कमजोर मत होने देना।”**
हर हर महादेव!
— पंडित श्री पूरन महाराज



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